भारतीय भाषाओं द्वारा ज्ञान

Knowledge through Indian Languages

Dictionary

अंतकारी

पुं.

संज्ञा
[सं.]
अंत या संहार करने वाला,विनाशक।
भक्त भय हरन असुर अंतकारी १० उ.—३१।

अंतगति

स्त्री.

संज्ञा
[सं.]
अंतिम दशा, मृत्यु।

अंतत

क्रि. वि.
[हि अंत]
अंत में।
जाति | स्वभाव मिटैं नहिं सजनी अंतत उबरी कुबरी-३ १८८।

अंतर

पुं.

संज्ञा
[सं.]
भेद, भिन्नता, अलगाव।
(क) जब जहाँ तन बेष धारौं तहाँ तुम हित जाइ। नैकु हूँ नहि करौं अंतर, निगम भेद न पाइ ६८३।
(ख) जो जासौं अंतर नहि राखै सो क्यों अंतर राखें—११९२

अंतर

पुं.

संज्ञा
[सं.]
मध्यवर्ती काल, बीस का समय।
(क) इहि अंतर नृपतभया आई।
(ख) पिता देखि मिलिबे को धाई-९-३। तेजु बदन झाँप्यो झुकि अंचल इहै न दुख मेरे मन मान। यह पैं दुसह जु इतनेहि अंतर उपजि परैं कछु आन –सा० उ. १५।

अंतर

पुं.

संज्ञा
[सं.]
ओट, आड़।
(क) जा दिन ते नैनन अंतर भयो अनुदिन अति बाढ़ति है बारि २७९५।
(ख) एक दिवस किन देखहू, अंतर रहौ छपाई। दस को है धौं बीस को नैननि देखौ जाइ – १०६८।
(ग) कठिन बचन सुनि स्रवन जानकी सकी न बचन सँभारि। तृन अंतर दै दृष्टि तरौंधी, दियों नयन जल ढारि-९-७९।
(घ) पट अंतर दै भोग लगायो आरति करी बनाइ-२६१।

अंतर

वि.
अंतर्द्धान, लुप्त।
अगर्व जानि पिय अंतर ह्वै रहे सो मैं बृया बढ़ायौ री-१८१६।

अंतर

क्रि. वि.
दूर, अलग, पृथक।
कहाँ गए गिरिधर तजि मोकौं ह्याँ कैसे मैं आई। सुरस्याम अंतर भए मोते अपनी चूक सुनाई-१८०३।

अंतर

पुं.

संज्ञा
[सं. अंतर]
हृदय, अंतःकरण, मन।
(क) गोबिंद प्रीति सबनि की मानत। जिहिं जिहिं भाइ करत जन सेवा, अंतर की गति जानत१-१३। (ख) सूर तो सुहृद मानि, ईश्वर अंतर जानि, सुनि सठ झूठौ हठ-कपट न ठानि-१-७७।
(ग) राजा पुनि तब क्रीड़ा करै। छिन भरहू अंतर नहि धरे-४-१२।
(घ) अंतर ते हरि प्रगट भए। रहत प्रेम के बस्य कन्हाई युवतिन को मिल हर्ष दए-१८३२।

अंतर

पुं.

संज्ञा
[सं. अंतर]
हृदय या मन की बात।
तब मैं कह्यौ, कौन हैं मोसी, अंतर जानि लई-१८०३।

अंतर

क्रि. वि.
भीतर, अंदर।
(क) ज्यों जल मसक जीव-घट अंतर मम माया इमि जानि—२-३८।
(ख) हौं अलि केतने जतन बिचारौं। वह मूरति वाके उर अंतर बसी कौन बिधि टारौं सा. ७५।

अंतर

क्रि. वि.
ऊपर, पर।
निरखि सुन्दर हृदय पर भृगु-पाद परम सुलेख। मनहूँ सोभित प्रभु अन्तर सम्भू-भूषन बेष-६६५।

अंतर

वि.
आंतरिक।
(क) मलिन बसन हरि हेरि हित अंतर गति तन पीरो जनु पातै-सा. उ.४६।
(ख) अंगदान बल को दै बैठी। मंदिर आजु आपने राधा अंतर प्रेम उमेठी–सा. १००।

अंतरगत

पुं.

संज्ञा
[सं. अंतर्गत]
हृदय, अतःकरण, चित।
ज्यों गूँगे मीठे फल को रस अंतरगत ही भावै—१२।

अंतरजामी, अँतरजामी

पुं.

वि.
[सं. अंतर्यामी]
हृदय की बात जानने वाला।
(क) कमल-नैन, करुनामय, सकल-अंतरजामी-१-१२४।
(ख) सूर बिनती करै, सुनहु नँद-नंद तुम कहा कहौ खोलि कै अंतरजामी-१-२१४।

अंतरदाह

पुं.

संज्ञा
[सं.]
हृदय की जलन; हृदय का संताप
अंतरदाह जु मिट्यो ब्यास कौ इक चित ह्वै भागवत किऐं-१-८९।

अंतरधान

पुं.

संज्ञा
[स अतर्द्धान]
लोप, अदर्शन।

अंतरधान

वि.
गुप्त, अलक्ष, अदृश्य।
करि अँतरधान हरि मोहिनी रूप कौं, गरुड़ असवार ह्वै तहाँ आए ८-८।

अंतरध्यान

पुं.

संज्ञा
[सं. अंतर्द्धान]
अदृश्य, अंतर्हित, लुप्त।
भयैं अंतरध्यान बीते पाछिली निस जाम–सा. ११८।

अंतरपट

पुं.

संज्ञा
[सं.]
परदा, आड़, ओट

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