भारतीय भाषाओं द्वारा ज्ञान

Knowledge through Indian Languages

Dictionary

अँटक्यौ

क्रि. अ.
भूत.
[हिं. अटकना]
फंस गया, उलझा, लगा रहा।
पूर सनेह ग्वालि मन अँटक्यौ अंतर प्रीति जाति नहिं तोरी-१०-३०५।
(ख) पद-रिपु पट अँटक्यौ न सम्हारति, उलटपलट उबरी-६५९।

अँटना

क्रि. अ.
[सं. अट् = चलना]
समा जाना।

अँटना

क्रि. अ.
[सं. अट् = चलना]
पूरा होना, खप जाना।

अंड

पुं.

संज्ञा
[सं.]
ब्रह्मांड, लोकपिंड, विश्व।
(क) सब्दादिक तैं पंचभूत सुंदर प्रगटाए। पुनि सबकौ रुचि अंड, आपु मैं आपु समाए २-३६।
(ख) तिनतैं पंचतत्व उपजायौ। इन सबकौ इक अंड बनायो-३-१३।
(ग) एक अंड कौ भार बहुत है, गरब धर्‌यौ जिय सेष-५७०।

अंड

पुं.

संज्ञा
[सं.]
कामदेव।
अति प्रचंड यह अंड महा भट जाहि सबै जग जानत। सो मदहीन दीन ह्वै बपुरो कोपि धनुष सर तानत-३३९२।

अंड

पुं.

संज्ञा
[सं.]
अंडा।

अंडा

पुं.

संज्ञा
[सं. अंड]
मादा जीव जन्तुओं से उत्पन्न गोल पिड जिसमें से बाद को बच्चा निकलता है।
यह अंडा चेतन नहिं होई। करहु कृपा सो चेतन होइ-३-१३।

अंडा

पुं.

संज्ञा
[सं. अंड]
शरीर।

अंत

पुं.

संज्ञा
[सं.]
समाप्ति, इति, अवसान।
लाज के साज मैं हुती ज्यों द्रोपदी, बढ्यौ तन-चीन नहिं अंत पायौ-१-५।

अंत

पुं.

संज्ञा
[सं.]
शेष भाग, अंतिम अंश।
सूरदास भगवंत भजन करि अंत बार कछ लहियै-१-६२।

अंत

पुं.

संज्ञा
[सं.]
सीमा, अवधि, पराकाष्ठा।
भुजा बाम पर कर छबि लागति उपमा अंत न पार-६८७।
(ख) सोभा सिन्धु न अंत रही री–१०-२९।

अंत

पुं.

संज्ञा
[सं.]
अंतकाल, मरण, मृत्यु।
(क) छन मंगुर यह सबै स्याम बिनु अंत नहिं सँग जाइ-.-१-३१७।
(ख) पर्‌यौ जु काज अंत की बिरियाँ तिनहुँ न अनि छुड़ायौ—२-३०।

अंत

पुं.

संज्ञा
[सं.]
फल, परिणाम।

अंत

पुं.

संज्ञा
[सं. अंतर]
अंतःकरण, हृदय

अंत

पुं.

संज्ञा
[सं. अंतर]
भेद, रहस्य।
(क) पूरन ब्रह्म पुरान बखानै। चतुरानन सिव अंत न जानै-१०-३।
(ख) जाको ब्रह्मा अंत न पावै–३९३।

अंत

पुं.

संज्ञा
[सं. अंत्र]
आँत, अंतड़ी।

अंत

क्रि. वि.
अंत में, निदान।

अंत

क्रि. वि.
[सं. अन्यत्र—अनत-अंत]
दूसरे स्थान पर, अलग, दूर।
कुंज कुंज में क्रीड़ा करि करि गोपिन कौ सुख देंहों। गोप सखन सँग खेलत डोलौं तिन तजि अंत न जैहौं।

अंतक

पुं.

संज्ञा
[सं.]
अंत करनेवाला, यमराज, काल।
भव अगाध-जल-मग्न महा सठ, तजि पद-कूल रह्यो। गिरा रहित ब्रृक-ग्रसित अजा लौं, अन्तक अनि गह्यो-१-२०१,

अंतक

पुं.

संज्ञा
[सं.]
सन्निपात ज्वर का एक भयंकर भेद जिसमें रोगी किसी को नहीं पहचानता।
व्याकुल नंद सुनते ए बानी।. डसि मानौं नागिनी पुरानी। ब्याकुल सखा गोप भए व्याकुल। अंतक दशा भयौ भय आकुल-२३६४९

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